निकाह के मसाइल | ख़ुत्बाए निकाह, मेहर, हमबिस्तरी, वलीमा

Nikah ke masail | Nikah, Mehr, Humbistari ki dua tarika aur Waleema

निकाह के मसाइल 
मेहर, हमबिस्तरी, वलीमा 

"बिस्मिल्लाहि र्रहमानिर्रहीम अल्हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलामीन"

अस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुर्सलीन! वल आकिबतुल मुत्तकीन । अम्मा बअद

{tocify} $title={Table of Contents}

निकाह 

निकाह की अहमियत अहादीस की रौशनी में 

👉 हज़रते आयशा रजि. से रिवायत है कि नबी (ﷺ) ने फरमाया: “निकाह मेरी सुन्नत है जिसने मेरी सुन्नत पर अमल ना किया उसका मुझसे ताअल्लुक नहीं।” (इब्नेमाजा 1846 बुखारी 5063)

👉 दुनिया सामान है और इस दुनिया का बेहतरीन सामान नेक बीवी है। (रावी-इब्ने उमर रजि. इब्ने माजा 1855)

👉 निकाह के लगवी मानी जम करना, मिलाना, गांठ बांधना और एक दुसरे में दाखिल होने के हैं। और शरई मानी "मियां-बीवी के बीच अकद जिससे वती (सोहबत) करना हलाल होता है।

👉 अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रजि. से रिवायत है कि नबी (ﷺ) ने फरमाया:
ऐ नौजवानों की जमाअत! तुम में से जिसे निकाह करने की ताकत हो, उसे निकाह करना चाहिये क्योंकि निकाह निगाह को बचाने वाला और शर्मगाह को महफूज रखने वाला है। और जिसे निकाह की ताकत (इस्तेताअत) न हो वह रोजों का एहतेमाम करे, इसलिए कि रोजा उसके लिए ढाल है।(बुख़ारी 5066 और मुस्लिम 2517)

👉 अबु हुरैरा रजि. से रिवायत है कि नबी (ﷺ) ने फरमाया:
"औरत से निकाह चार वजहों से किया जाता है -
1. उसके माल की वजह से 2. उसके खानदान की वजह से 3. उसके हुस्न व जमाल की वजह से और 4.उसके दीनदारी की वजह से।" तुम दीनदार औरत को तरजीह दो"| (बुख़ारी 5090, मुस्लिम 2681 , अबु दाऊद, नसई, इब्नेमाजा और तिर्मिजी)

👉 नबी (ﷺ) ने फरमाया: “तुम में से जब कोई किसी औरत को निकाह का पैगाम दे, अगर मुमकिन हो तो उसे कुछ देख ले। (मुसनद अहमद और अबुदाऊद 2063-सनद सही है)

👉 नबी (ﷺ) ने फरमाया- "वली के बगैर निकाह नहीं होता।” (अबुदाऊद 2066, नसई, इब्नेमाजा, तिर्मिजी) 

👉 नबी (ﷺ) ने फरमाया- “जिस किसी औरत ने अपने "वली" की इजाजत के बिना निकाह किया" उसका निकाह बातिल है। (अबुदाऊद 2064) (तिर्मिजी, अबुदाऊद, इब्ने माजा) (सही)

👉 मुश्रिका औरतों से निकाह करना मोमिनों पर हराम है (सूरह नूर-3)

👉 बेवा औरतों के निकाह कर दिया करो। (सूरह नूर-32)

👉 अबु हुरैरा रजि. से रिवायत है, फरमाया नबी (ﷺ) ने कि -
“बेवा औरत का निकाह उससे सलाह किये बिना और कुंवारी औरत का निकाह उससे इजाजत लिये बिना न किया जाये। कुंवारी औरत की इजाजत "उसका ख़ामोश रहना है।" (बुख़ारी 5136, मुस्लिम 2568)

ख़ुत्बाए निकाह का तर्जुमा

रावी-अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि:

बेशक सारी तारीफ अल्लाह ही के लिये है। हम उसी से मदद तलब करते हैं। उसी से मग्फिरत (बख्शिश) चाहते हैं। अपने नफ्स की बुराई से अल्लाह की पनाह चाहते हैं। जिसे अल्लाह हिदायत दे, उसे कोई गुमराह करने वाला नहीं। जिसे वह गुमराह करे, उसे कोई हिदायत दे नहीं सकता। हम गवाही देते हैं कि "अल्लाह के सिवाए कोई इबादत के लायक नहीं और मुहम्मद सलल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के बन्दे और रसूल हैं।” 

ऐ लोगो! अपने रब से डरो जिसने तुमको एक जान से पैदा किया और उसी से उसका जोड़ा बनाया फिर उन दोनों से बहुत से मर्द व औरत दुनिया में फैला दिये। 

उस अल्लाह से डरो जिसका वास्ता देकर एक-दूसरे से तुम अपने हक मांगते हो और रिश्ते-नाते काटने से (बिगाड़ने से) परहेज करो। यकीन जानो कि अल्लाह तुम पर निगरां है। (सूरह निसॉ-आयत 01) 

ऐ लोगों! जो ईमान लाये हो, अल्लाह से डरो, जिस तरह अल्लाह से डरने का हक है, और तुम्हें मौत न आये मगर इस हाल में की तुम मुसलमान हो। (आले इम्रान-आयत 102) 

ऐ लोगों! जो ईमान लाये हो- (ऐ ईमान वालों) अल्लाह से डरो और बात सीधी-सीधी कहो! (इस तरह) वह तुम्हारे आमाल दुरूस्त कर देगा, तुम्हारे गुनाह माफ कर देगा। जिसने अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) की इताअत की, उसने बड़ी कामयाबी हासिल की। (सूरह अहजाब-आयत-70-71) इसे (अहमद, अबु दाऊद 2100, तिर्मिजी,नसई इब्ने, माजा) ने रिवायत किया है।

निकाह करने वालो के लिए दुआ 

जब कोई निकाह करता तो नबी सल्ल. उसे इन लफ्जो में दुआ देते:

🌷 "बार कल्लाहु ल क व बारक अलैक व जमाआ बय न कुमा फी खैर' " 🌷
अल्लाह बरकत अता करे और तुम पर बरकत नाजिल करे और तुम दोनो को भलाई और खैर पर जमा रखे।  (तिर्मिजी /अबु दाऊद 2112/नसई/इब्नेमाजा/अहमद) (तिर्मिजी/इब्ने खजीमा/इब्ने हब्बान ने सही कहा।

इब्ने अब्बास रजि. से रिवायत है- फरमाया नबी सल्ल. ने 

"अगर तुम में से कोई अपनी बीवी के पास जाते वक्त यह दुआ पढ़े- " बिस्मिल्लाही अल्ला हुम्मा जन्नबर शैतान व जन्नबिश्शैतान मा रजकत ना'' अल्लाह के नाम से - ऐ अल्लाह हमे शैतान से दूर रख और शैतान उस से दूर कर दे जो तू हमे औलाद अता करे इस मिलन से उनकी तकदीर में अगर औलाद होगी तौ शैतान उसे कभी नुकसान न पहुंचा सकेगा। (बुखारी 5165/ मुस्लिम 2609)

निकाह की फजीलत. 

👉 1. निकाह इंसान में शर्म और हया पैदा करता है। (मुस्लिम-2517)

👉 2. निकाह आदमी को बदकारी से बचाता है। (मुस्लिम-2518)

👉 3. निकाह जिन्सी आलूदगी, जिन्सी हिजान, शैतानी ख्यालात से बचाता है। (मुस्लिम 2518)

👉 4. निकाह आपसी मोहब्बत और मुरव्वत का बेहतरीन जरिया है। (इब्ने माजा-सही)

👉 5. निकाह राहत व सुकून हासिल करने का सबब है। (नसई- सही और सूरह रूम आयत 21)

👉 6. निकाह से दीन मुकम्मल होता है। (बैहकी-हसन)

👉 7. निकाह नस्लें इंसानी के बाकी रहने का जरिया है। (नसई हसन)

👉 8. जो बुराई से बचने की नियत से निकाह करे, अल्लाह उसकी मदद करता है। (नसई हसन)

मेहर और उसके मसाइल

🌷 मर्द निकाह के वक्त जो माल, रकम या कोई फायदेमन्द चीज औरत को दे वह "मेहर" कहलाता है। इसकी कोई कम से कम या ज़्यादा से ज़्यादा हद मुकर्रर नहीं है। बेहतरीन "मैहर" वह है जिसका देना आसान हो। (अबु दाऊद -2117) 

🌷 ज़्यादा बा बरकत वह औरतें है- जिनके मेहर कम हो। (मुगनी 9)

🌷 जिन शर्तों को पूरा करना सबसे ज़्यादा जरूरी है, वह शर्ते हैं जिनके साथ तुमने शर्मगाहों को हलाल किया। (मुस्लिम 2567)

🌷 अगर कोई शख़्स बिना मेहर तय किये शादी करे तो औरत के लिये “मेहरे मिस्ल' वाजिब होगा। (मुस्लिम)

🌷 कम या थोड़े मेहर की दलील आप सल्ल.का एक सहाबी से मेहर के ऐवज (में) लोहे की अंगूठी का मुतालबा करना है और फिर वह भी उस सहाबी के पास न होने पर कुरआन की कुछ आयतों को मेहर के बदले बीवी को सिखला देना है (बुख़ारी 5087 मुस्लिम 2578) अबु दाऊद 2092-93/ मुस्लिम)

🌷 मेहर ज़्यादा बांधने की दलील अल्लाह तआला का यह फरमान कि "अगर तुम बीवियों को ख़जाना दे चुके हो तो वापिस न लो" है। (सूरह निसा 4:20) 

🌷 शौहर के लिये बीवी को उसका हक मेहर अदा करना जरूरी है (सूरह निसा 4:24)

🌷 औरत अपनी खुशी से सारा या मेहर का कुछ हिस्सा माफ करना चाहे तो माफ कर सकती है। (सूरह निसा 4:4) 

🌷 "मेहर निकाह के वक्त अदा करना या बाद में अदा करना दोनों तरह जाइज है। (निकाह से पहले मेहर तय न हुआ हो तो बाद में भी तय किया जा सकता है। निकाह के बाद सुहबत से पहले अगर कोई शख्स तलाक दे दे और मेहर तय नहीं हुआ था तो उस पर मेहर अदा करना वाजिब नहीं अलबत्ता अपनी हैसियत के मुताबिक कुछ न कुछ औरत को देना चाहिये। (सूरह बकरह 2:236) 

🌷 निकाह के बाद, सुहबत से पहले जबकि मेहर तय हो चुका हो, कोई शख्स अपनी बीवी को तलाक दे दे तो उस पर आधा मेहर अदा करना वाजिब (जरूरी है।) (सूरह बकर 2:237) 

🌷 औरतों को उनके मेहर खुशी-खुशी अदा करों। (सूरह निसा 4:24) 

🌷 अगर शौहर निकाह के बाद और हम बिस्तरी (मिलने) से पहले फौत हो जाये तो औरत पूरे मेहर की हकदार होगी। (अबु दाऊद 2095)

हमबिस्तरी की दुआ और आदाब

👉 1. इब्ने अब्बास रजि. से रिवायत है कि नबी सल्ल. ने फरमाया-जब तुम लोगों में से कोई अपनी बीवी के पास आने का इरादा करे तो यूं कहे।" अल्लाह के नाम से! या अल्लाह! हमें शैतान से दूर रख और उस से भी शैतान को दूर रख जो तू हमें अता करे। (बुख़ारी 5165/मुस्लिम 2609) 

👉 2. नबी सल्ल. ने फरमाया- जब कोई हलाल तरीके (बीवी) से शहवत पूरी करता है तो उसके लिये सवाब है। (मुस्लिम) 

👉 3. जुमेरात में सोहबत करना मुस्तहब है। (तिर्मिजी-सही) 

👉 4. बच्चे को दुध पिलाने की मुद्दत में हमबिस्तरी करना जायज है। (मुस्लिम) 

👉 5. दिन के वक्त हमबिस्तरी करना जाइज है। (बुख़ारी) 

👉 6. अगर कोई दूसरी बार सोहबत करना चाहे तो (दूसरी) सोहबत से पहले वुजु कर ले। (मुस्लिम) 

👉 7. हमबिस्तरी के बाद एक दूसरे की राज़ की बातें औरों पर जाहिर करना मना है। 

👉 नबी सल्ल. ने फरमाया- कयामत के दिन अल्लाह के नजदीक सबसे बुरा वह शख्स है जो बीवी के पास जाये और बीवी उसके पास आये और फिर वह अपनी बीवी के राज की बातें लोगों को बतलाए। (मुस्लिम 2617) 

👉 नबी सल्ल. ने फरमाया- तुम में से हर शख्स हाकिम है और अपनी रअइयत के बारे में जवाब देह है। मर्द अपने घर वालों पर हाकिम है और औरत अपने ख़ाविन्द के घर और उसकी औलाद पर हाकिम है। (बुख़ारी) 
इसलिये अपनी-अपनी जिम्मेदारियां निभाना दोनों पर वाजिब है।

वलीमा 

"वलीमा'' का मआनी जमा होने, इकटठा होने के हैं। मिया बीवी चूंकि इकटठा होते हे इसलिए यह खाना वलीमा कहलाता है। 

👉 1. दावते वलीमा करना सुन्नत है। (बुख़ारी/मुस्लिम-2584/2589)

👉 2. दावते वलीमा कुबुल करना वाजिब है। (मुस्लिम-2595/2605) 

👉 3. जिस वलीमा में आम आदमियों को न बुलाकर सिर्फ ख़ास लोगों को दावत दी जाये तो वह बदतरीन वलीमा है (मुस्लिम-2603)

👉 4. दावते वलीमा कुबुल न करने वाला अल्लाह और उसके रसूल का ना फरमान है। (मुस्लिम-2603/बुख़ारी 5177)


👉 5. रिया, (दिखावा) तकब्बूर, (घमण्ड) और बड़ाई जाहिर करने वाले लोगों की दावत में शिर्कत करना मना है। (अबु दाऊद-सही) 

👉 6. काजी अयाज रह ने इस पर अजमाअ नकल किया है कि वलीमे में कमी-बेश की कोई कैद नहीं बल्कि हस्बे जरूरत और हस्बे हैसियत वलीमे का खाना बनाया जा सकता हैं, चाहे वह थोड़ा हो या ज़्यादा। (नील अल अवतर 0048260) 

👉 7. यह दावत दुल्हा-दुल्हन के मिलन से पहले या बाद कभी भी की जा सकती है। (अल फिक्ह अल मजाहिब बर बदल 002 1 33-34)

👉 8. दावते वलीमा का मुस्तहिब वक्त चारो फिक्ही मसलकों में निकाह के बाद है।

निकाह में जाइज काम 

✅ 1. ईद के महीने में निकाह करना जाइज है। (मुस्लिम-2575) 

✅ 2. निकाह और रूखसती अलग-अलग करना जाइज है। (मुस्लिम/बुख़ारी 5133) 

✅ 3. जवानी से कब्ल बेटी का निकाह करना जाइज है। (तलाक 4/बुख़ारी 5133)

निकाह से मुताल्लिक वह काम (बातें) जो सुन्नत से साबित नहीं

1. निकाह से पहले मंगनी की रस्म अदा करना।
 2. मंगनी के वक्त लड़के को सोने की अंगूठी पहनाना।
❌ 3. मेहंदी और हल्दी की रस्म अदा करना।
❌ 4. दुल्हन को मेहंदी लगाना जाइज है लेकिन उसके लिए इज्तेमाअ करना और गाना-बजाना जाइज नहीं।
❌ 5. निकाह से पहले मंगेतर को 'मेहरम' समझना।
❌ 6. ख़ास 786 रूपये हक मेहर मुकरर्र करना या मर्द की हैसियत से बढ़कर हक मेहर मुकर्रर करना।
❌ 7. बेटी को घर बनाने के लिए दहेज (सामान) मुहैया करना।
❌ 8. दहेज का मतालबा करना।
❌ 9. दूल्हा को सेहरा बांधना।
❌ 10. बारात में कसीर तादाद ले जाना।

❌ 11. बारात के साथ बैण्ड-बाजा ले जाना।
❌ 12. खुत्बा ए निकाह से पहले लड़की और लड़के को कलम ए शहादत पढ़वाना।
❌ 13. निकाह के बाद हाजिरी ने मजलिस में छुहारे लुटाना।
❌ 14. दूल्हा के जूते चुराना और पैसे लेकर वापिस करना। 
❌ 15. दुल्हन को कुरआन के साये में घर से विदा करना।
❌ 16. मुंह दिखाई और गोद भराई की रस्म अदा करना।
❌ 17. माइया बैठने की रस्म अदा करना। 
❌ 18. मुहर्रम और ईद के महीनों में शादी न करना। 
❌ 19. अपनी हैसियत से बढ़कर दावते वलीमा करना। 
❌ 20. नाच-गाने का एहतमाम करना।

❌ 21. मर्दो और औरतों की मखलूत महफिलों की तसावीर बनाना।
❌ 22. लड़की का कुरआन से निकाह करना। 
❌ 23. निकाह के वक्त मस्जिद के लिये कुछ रकम वसूल करना। 
❌ 24. तलाक की नियत से निकाह करना। 
❌ 25.दौराने हमल निकाह करना। 
❌ 26. दूसरे निकाह के लिये पहली बीवी से इजाजत लेना। 
❌ 27. शादी,मंगनी व बच्चे की पैदाइश वगैरह के मौके पर पहनावनी का एहतमाम करना। 
❌ 28. घरों के रोशन करना। 
❌ 29. शादी के मौके पर आतिशबाजी करना। 
❌ 30. बारात में उछलना-कुदना या नाचना। 
❌ 31. मांडा (निकाह से पहले खाना) करना। 
❌ 32. बिन्दौरा करना। 
❌ 33. चौथी करना।

मिसाली शोहर | बेहतरीन शोहर की मिसाल 

✅ नबी सल्ल. ने फरमाया- तुममे से से बेहतरीन शख्स वह है जो अपने अहलो अयाल के लिये अच्छा हो। (तिर्मिजी/हाकिम-सही)

✅ बीवी को न मारने वाला शख़्स बेहतरीन शौहर है। (अबु दाऊद-सही)

✅ आजमाईश और मुसीबत में सब्र करने वाला शख्स बेहतरीन शौहर है। (तिर्मिजी-सही)

✅ बीवी के मामलात में दरगुजर करने वाला, नर्मी से काम लेने वाला बीवी के हक में खैर व भलाई की बात कुबुल करने वाला शख्स बेहतरीन शौहर है। (मुस्लिम) 

✅ अपने घर वालों (बीवी-बच्चों) पर खुश दिली से ख़र्च करने वाला शख़्स बेहतरीन शौहर है। (तिर्मिजी-सही) 

✅ घर के काम-काज में बीवी का हाथ बंटाने वाला शख्स बेहतरीन शौहर है। (बुख़ारी)

मिसाली बीवी | बेहतरीन बीवी की मिसाल

✅ कुवारी, मीठी बातें करने वाली, (शीरी गुफ्तार) खुशमिजाज, कनाअत पसन्द (थोडे पर खुश होने वाली) और ज़्यादा बच्चे जनने वाली औरत बेहतरीन बीवी है। (इब्ने माजा-सही)

✅ शौहर की गैर मौजुदगी में उसके माल और उसकी इज़्जत की हिफाजत करने वाली बेहतरीन बीवी होती है। (तबरानी-सहीह) 

✅ शौहर की इताअत करने वाली वफादार बीवी अच्छी बीवी होती है। (तबरानी-सही)

✅ औलाद से मोहब्बत करने वाली और अपने शौहर की तमाम मामलात में अमानतदार औरत बेहतरीन बीवी है। (मुस्लिम) 

✅ पांचो नमाजों की पाबन्दी करने वाली रमजान के रोजे रखने वाली और पाक दामन औरत बैहतरीन बीवी होती है। (इब्ने हब्बान-सही) 

✅ शौहर को खुश रखने, उसकी इताअत करने, अपनी जान व माल शौहर पर कुर्बान करने और शौहर की आख़िरत का ख्याल रखने वाली बीवी बेहतरीन बीवी होती है। (नसई-हसन)

मियां-बीवी के एक-दूसरे पर हुकूक

👉 मर्दों पर औरतों का वैसा ही हक है जैसा मर्दो का हक औरतों पर है, अलबत्ता मर्दो को एक दर्जा (फजीलत) हासिल है। (सूरह बकर 2:228)

👉 मर्द हाकिम और मुहाफिज़ हैं औरतों पर इसलिये कि वह अपना माल खर्च करते हैं। (सूरह निसा 4:34)

👉 जो नेक बीवियों होती हैं, वह अदब वाली और फरमाबर होती हैं। मर्दो के छिपे भेद और अपनी पाक दामिनी की हिफाजत करती है। (सूरह निसा 4:34)

👉 खैर और नेकी के कामों में एक-दूसरे को ताकीद करना और रगबत दिलाना दोनों पर वाजिब है। (अबु दाऊद-सही)

👉 अजदवाजी जिन्दगी (आपसी रिश्तों) के राज किसी पर जाहिर न करना दोनों पर वाजिब है। (मुस्लिम)

👉 अपने-अपने दायरे कार में अपनी-अपनी जिम्मेदारियां पूरी करना दोनों पर वाजिब है। (बुख़ारी)

👉 निकाह घर बसाने की नीयत से हो, मस्ती करने या अय्याशी की गरज से नहीं। (सूरह निसा-24/माईदा-5)

👉 अबु हुरैरा रजि. से रिवायत है कि नबी सल्ल. ने फरमाया- 

जो कोई अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखता है, वह अपने हम साये (पड़ोसी) को तकलीफ न दे और औरतों के बारे में भलाई की वसीयत कुबूल करों! बेशक! उनको पसली से पैदा किया गया है और पसली का ज्यादा टेढ़ा हिस्सा ऊपर वाला होता है, लिहाजा अगर कोई उसे सीधा करने कोशीश करेगा तो उसे तोड़ बैठेगा और अगर उसे उसके हाल पर छोड़ देगा तो वह हमेशा वैसे ही रहेगी। पस औरतों के हक में हमेशा भलाई की वसीयत कुबूल करो (तोड़ने से मुराद तलाक देना है) (बुख़ारी/मुस्लिम-2688/89)

निकाह के लिए हराम रिश्ते 

यानि वह रिश्ते या औरतें जिनसे निकाह करना हराम है। इन हराम रिश्तों की दो किस्मे
(अ) मुस्तकिल (हमेशा के लिए) हराम रिश्ते (औरतें) (ब) आरजी (वक्ती) हराम रिश्ते (औरतें)

(अ) मुस्तकिल हराम रिश्तों के असबाब तीन है 

(1) नसब (खूनी रिश्ता) (2) मुसाहरत (ससूराली रिश्ते) (3) रजाअत (दूध पिलाना) नसब सूरह निसॉ आयत 23 में अल्लाह तआला ने नसब की वजह से सात औरतों को हराम बताया है। 

❌ 1. मांएं:- माऐं, दादियां और नानियां (सब शामिल) है। 
❌ 2. बेटियां:- इसमें अपनी हकीकी बेटियां, पौतियां, नवासियां सब शामिल है। 
❌ 3. बहनें:- सगी बहनें, मां की तरफ से सौतेली बहनें, बाप की तरफ से सोतेली बहनें सब शामिल है। 
❌ 4. फूफियां:- सगी और सौतेली सब शामिल है। 
❌ 5. खालायें:- अपनी खाला, वालिद दादा, नाना, मां, दादी, नानी, सब की। 
❌ 6. भतीजियां:- सगे भाई की बेटियां, सौतेले भाई की बेटियां, सब शामिल है। 
❌ 7. भांजियां:- सगी बहिन की बेटियां, सौतेली बहिन की बेटियां सब शामिल है। 

मुसाहरत (ससुराल की वजह से हराम रिश्ते) 
❌ (अ) सौतेली मांओं से निकाह हराम है। (निसा- आयत 22) 
❌ (ब) सगे बेटों की औरते भी तुम पर हराम है। (निसा-23) 
❌ (स) औरतों की मां यानी सास से निकाह हराम है। (निसा-23) 
❌ (द) तुम्हारी वह बीवियां जिनसे तुम सोहबत कर चुकें हो उनकी पिछली बेटियां जो तुम्हारी परवरिश में हो तुम पर हराम है। (निसा-23) 

रज़ाअत की वजह से हराम रिश्ते: आयशा रजि. से रिवायत है कि नबी सल्ल. ने फरमाया नसब की वजह से जो औरतें हराम हैं वह दूध पिलाने से भी हराम होंगी। (मुस्लिम 2637)

(ब) आरजी हराम रिश्ते । 

❌ 1. दो बहनों को सगी हो या सौतेली एक साथ निकाह में जमा करना हराम है। (निसा-23) 
❌ 2. नबी सल्ल. ने मना किया औरत और उसकी खाला और फूफी को एक निकाह में जमा करने से। (बुखारी-5108) 
❌ 3. वह औरतें तुम पर हराम हे जो किसी दूसरे के निकाह में हों। (निसा-24) 
❌ 4. इद्दत के दौरान मुतल्लका या बेवा से निकाह हराम है। 
❌ 5. तीन तलाकें (जुदा-जुदा मजलिसों में) देने के बाद अपनी मुतल्लका से दोबारा निकाह करना हराम है। 
❌ 6. पाक दामन मर्द या औरत का ज़ानिया औरत या जानी मर्द से निकाह हराम है। (सुरह नूर-26) 
❌ 7. मोमिन मर्द का मुशरिका औरत से और मोमिना औरत को मुशरिक मर्द से निकाह करना हराम है। (बकर-221)
❌ 8. ऐहराम वाली औरत से उस वक्त तक निकाह करना जाइज नहीं जब तक के वह ऐहराम (हज या उमरे के) से अलग ना हो जाऐ। (मुस्लिम 2555) 

व सल्ल्ललाहु अला नबीयिना मुहम्मद व अला आलिही व अस्हाबिही अजमईन। 
। बिरहमतिका या अरहमरराहेमीन। 
व आखिरू दअ वा ना अनिल हम्दू लिल्लाहि रब्बिल आलामीन।
वास्सलाम! 
✒️ मुहम्मद सईद
मो. 9214836639

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने

Trending Topic