इस्लाम में नारी का महत्व और सम्मान - Part-1
इस्लाम में नारी का महत्व और सम्मान - Part-1

यदि आप सभी धर्मों का अध्ययन करें तो पाएंगे कि हर युग में महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार किया गया ।

हर धर्म में महिलाओं का महत्व पुरुषों की तुलना में कम रहा। बल्कि उनको समाज में तुच्छ समझा गया, उन्हें प्रत्येक बुराइयों की जड़ बताया गया, उन्हें वासना की मशीन बना कर रखा गया। एक लम्बा युग महिलाओं पर ऐसा ही गुज़रा कि वह सारे अधिकार से वंचित रही।
लेकिन यह इस्लाम की भूमिका है कि उसने हव्वा की बेटी को सम्मान के योग्य समझा और दुनिया में सबसे पहले महिलाओं के अधिकार के लिए आवाज़ उठाई।


मैं तुममें से किसी कर्म करनेवाले के कर्म को अकारथ नहीं करूँगा, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। तुम सब आपस में एक-दूसरे से हो। (आले इमरान 3:195)


और बहुत से अधिकार दिए जो वो रखती हे , लेकिन फिर भी गैर मुस्लिम द्वारा हवाए चलाई जाती हे और कुछ हमारे कम इल्मी भाई बहने भी यही सोचते की इस्लाम में औरतो(नारी Khwatin) को बहुत कम अधिकार दिए गए 🤔 पर ऐसा नही

इस्लाम में महिलाओं का स्थान –

इस्लाम में महिलाओं का बड़ा ऊंचा स्थान है। इस्लाम ने महिलाओं को अपने जीवन के हर भाग में महत्व प्रदान किया है। माँ के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, पत्नी के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, बेटी के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, बहन के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, विधवा के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, खाला के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, तात्पर्य यह कि विभिन्न परिस्थितियों में उसे सम्मान प्रदान किया है

जिन्हें बयान करने का यहाँ अवसर नहीं हम तो बस उपर्युक्त कुछ स्थितियों में इस्लाम में महिलाओं के सम्मान पर संक्षिप्त(short) में समझाएंगे इन शा अल्लाह ।

माँ के रूप में सम्मान–

माँ होने पर उनके प्रति क़ुरआन ने यह चेतावनी दी कि
“और हमने मनुष्य को उसके अपने माँ-बाप के मामले में ताकीद की है – उसकी माँ ने निढाल होकर उसे पेट में रखा और दो वर्ष उसके दूध छूटने में लगे – कि मेरे प्रति कृतज्ञ (Grateful) हो और अपने माँ-बाप के प्रति भी। अंततः मेरी ही ओर आना है॥14॥”


कुरआन ने यह भी कहा कि –

“तुम्हारे रब ने फ़ैसला कर दिया है कि उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो और माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। यदि उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ तो उन्हें ‘उँह’ तक न कहो और न उन्हें झिझको, बल्कि उनसे शिष्टापूर्वक(सही ढंग से)बात करो॥23॥

और उनके आगे दयालुता से नम्रता की भुजाएँ बिछाए रखो और कहो, “मेरे रब! जिस प्रकार उन्होंने बालकाल में मुझे पाला है, तू भी उनपर दया कर।”॥24॥ (सूरः बनीइस्राईल 23-24)

» हदीस : माँ के साथ अच्छा व्यवहार करने का अन्तिम ईश्दुत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने भी आदेश दिया,
एक व्यक्ति उनके पास आया और पूछा कि मेरे अच्छे व्यवहार का सब से ज्यादा अधिकारी कौन है?
आप ने फरमायाः तुम्हारी माता,
उसने पूछाः फिर कौन ?
कहाः तुम्हारी माता.
पूछाः फिर कौन ?
कहाः तुम्हारी माता,
पूछाः फिर कौन ? कहाः तुम्हारे पिता ।
मानो माता को पिता की तुलना में तीनगुना अधिकार प्राप्त है।(सहीह बुखारी हदीश नंबर 5626)

एक सहाबी अल्लाह के ईशदूत के पास आये और जिहाद में जाने की इजाजत मांगने लगे तो उन्होने कहा क्या तुम्हारी माँ हे तो सहाबी ने कहा हा हे तो ईशदूत(saw) ने कहा की जाओ उनकी सेवा करो इज्जत करो और उनसे चिमट जाओ क्योकि आपकी माँ के पैरो निचे स्वर्ग हे। (Shu’abul imaan, hadis No.7448 )
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