इस्लाम में औरतो की इज्जत और गैर धर्म क्या Part-12

इस्लाम में औरतो की इज्जत और गैर धर्म क्या Part-12

इस्लाम में औरतो की इज्जत और गैर धर्म क्या Part-12

इस्लाम आखरी समय तक विवाह (Shadi) ना टूटने की संभावना को जिन्दा रखता है। लेकिन इद्दत के टॉपिक पे कुछ रौशनी डालना चाह रहा हु

क्यों जरूरत हे इद्दत की और क्यों नियम हे ये -


इद्दत औरत अपने शौहर के घर मे ही गुजारे हो सकता हैं अल्लाह उन दोनों मियां बीवी मे फिर से मोहब्बत पैदा कर दे और वह औरत और आदमी वापस से अपना घर बसाले और औरत जबतक उसके घर मे हो उसके पुरे खर्च की जिम्मेदारी आदमी की है। और अल्लाह ने भी कुरआन मे यही कहा है।
ऐ रसूल (मुसलमानों से कह दो) जब तुम अपनी बीवियों को तलाक़ दो तो उनकी इद्दत (पाकी) के वक्त तलाक़ दो और इद्दा का शुमार रखो और अपने परवरदिगार ख़ुदा से डरो और (इद्दत के अन्दर) उनके घर से उन्हें न निकालो और वह ख़ुद भी घर से न निकलें मगर जब वह कोई सरीही बेहयाई का काम कर बैठें (तो निकाल देने में मुज़ायका नहीं) और ये ख़ुदा की (मुक़र्रर की हुई) हदें हैं और जो ख़ुदा की हदों से तजाउज़ करेगा तो उसने अपने ऊपर आप ज़ुल्म किया तो तू नहीं जानता यायद ख़ुदा उसके बाद कोई बात पैदा करे (जिससे मर्द पछताए और मेल हो जाए)। (कुरआन 65:1)

इस आयत की तफ्सीर मे इब्ने कसीर मे और तबरी मे भी यही है की औरत का खर्च उसका शौहर उठाऐ।

संघी हिन्दू लोग इसे औरतों के ऊपर इस्लाम का अत्याचार बताता है जबकि इसका मतलब यह है कि यदि वह लड़की या महिला “गर्भ (Pregnent)” से है तो वह शारीरिक रूप से Clear (साफ) होकर पूरे समाज के सामने आ जाए और ना उस महिला के चरित्र(character)पर कोई उंगली उठा पाए और नही उसके उसके बच्चे को नाजायज़ होने पर।

यहाँ तक की बच्चे के होने की हालात (यानि प्रेग्नेंट हो या शक जो इस तरह का) में तलाक भी नही ले सकती अगर औरत चाहे तो ?

इद्दत की टाइम पूरा होने के बाद वह लड़की अपना जीवन अपने हिसाब से जीने के लिए स्वतंत्र(आजाद) है। और अक्सर
ऐसी तलाक शुदा लड़कियों का पुनः विवाह(फिर से शादी) खानदान के लोग कुछ महीनों अथवा साल दो साल में करा ही देते हैं
और इसी छोटी समय में उसे निकाह मे मिले “मेहर”【मैहर अगर लड़की चाहे निकाह के वक्त उतनी ले सकती हे या पहले से बात कर सकती हे 】का रुपए उपयोग में आता है।

ध्यान दीजिए कि इस्लाम मे “तलाकशुदा” का पुनर्विवाह और “विधवा विवाह” कराना बेहद पुण्य(सवाब) का काम माना गया है और ऐसे विवाह को ही अपनी कौम में इसे जरूरी बनाने के लिए हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खुद ही ऐसी “विधवा और तलाकशुदा महिला” से विवाह करके उदाहरण बताया है और इस कारण से ऐसा करना “सुन्नत” है जो बेहद पुण्य(सवाब) का काम है।

सदैव ही यदि स्त्री(औरत)की इच्छा होती है तो उसका पुनर्विवाह कुछ ही दिनों में हो जाता है, ना तो उसे कोई कुलटा ,
कलमुही कहता है नहीं और किसी टाइप की बोहतन लगा सकता हे और ना ही कोई उसके विवाह टूटने का जिम्मेदार उसे मानता हे।

यह निकाह, तलाक स्त्रियों(औरतो) के चाहने के उपर होता है और इसके लिए उस महिला पर कोई ज़बरदस्ती नहीं कर सकता और कम से कम हर समाज की महिला तो ऐसी ही होती है कि वह बार बार पुरुष ना बदलें।


इस्लाम की इसी व्यवस्था के कारण मुसलमानों के घरों में बहुएँ बेटियों को जलाया, मारा अथवा मारकर लटकाया नहीं जाता क्युँकि अलगाव(बटवारा Division) की प्रोसेस बेहद आसान है। ना कि गैर मुस्लिमो की तरह पंचायत बैठाना सभी के सामने और इज्जत खराब करना औरत या मर्द की और ना “अदालत” की तरह जटिल जहाँ पति-पत्नी के पूरे परिवार के इज़्ज़त की धज्जियाँ पति-पत्नी के अलगाव(अलग होने) के लिए ही उड़ा दी जाती हैं। पत्नी का दूसरे पुरुष से नाजायज़ संबंध बताया जाता है और पति को नपुंसक। और गैर मुस्लिम हिन्दुओ में न तो तलाक हे ना खुला लेने की प्रोसेस अधिकार हें। और इसी बेईज़्ज़ती से बचने के लिए बहुएँ मार या मरवा दी जाती हैं।



To be continued ...
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