इस्लाम में औरतो के हुकूक इज्जत और आज का मआशरा किस और? Part-13

इस्लाम में औरतो के हुकूक इज्जत और आज का मआशरा किस और? Part-13

इस्लाम में औरतो के हुकूक इज्जत और आज का मआशरा किस और? Part-13


न इल्म लेने की तलब, न मौलानाओ की तबलीग और दिनी मेहनत -

शादी निकाह और आज का माहोल --
"तुम मे से जो मर्द और औरत बेनिकाह हो उनका निकाह कर दो और अपने गुलाम और लौंडियो का भी! अगर वो मुफ़लिस भी होगे तो अल्लाह अपने फ़ज़ल से गनी बना देगा| अल्लाह कुशादगी वाला और इल्म वाला हैं| (सूर: नूर 24-32)

कुरआन की आयत से साबित हैं के निकाह करना-कराना अल्लाह का हुक्म है जिसके लिये अमीर या गरीब होना शर्त नही!

निकाह की अहम बात मेहर की अदाएगी है। इसके बगैर निकाह नहीं है। हजरत अली (रजि0) का निकाह जब फातिमा (रजि0) से करने का नबी करीम (ﷺ) ने इरादा किया तो हजरत अली (रजि0) से कहा कि तुम्हारें पास मेहर में देने के लिए कुछ है तो उन्होंने कहा कि ज़िरह के इलावा मेरे पास कुछ नहीं है। फिर अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने उस ज़िरह को फरोख्त करके मेहर की अदाएगी और कुछ जरूरी सामान की फराहमी की हिदायत की【नबी ﷺ ने यहाँ मर्द को हुक्म किया देने का नाकि औरत को】।

गलत रस्मों रिवाज़:

ये सब छोड़ शादी में रायज रस्मों में खुशी के शादियाने और बाजे भी हैं। शादी से पहले कई दिन तक नौजवान लड़कियां शादी वाले घर में रातों को घंटो तक गाना बजाती और गाती हैं। मोहल्ले वालों की नींद खराब होती है। मेहँदी की रस्म ,बारात के साथ बैण्ड बाजे का एहतमाम किया जाता हैं। जिनमें फिल्मी गानों की धुनों पर साज व आवाज का जादू जगाया जाता है और अब मंगनी के मौके पर भी ऐसा किया जाने लगा है। शादी वाले घर के लोग ऑरकेस्ट्रा या राती जगह जैसी गलत रस्मों का एहतमाम करते हैं जिसमें नौजवान हिस्सा लेते हैं। बेहयाई पर मबनी हरकतों से लोगों के ईमान व अखलाक को बर्बाद किया है। कुछ लोग इन तमाम खुराफात और शैतानी रस्मों रिवाज के जवाज के लिए उन हदीस से इस्तदलाल(हवाला,बात) करते हैं जिनमें शादी और ईद यानी खुशी के मौके पर छोटी बच्चियों को डफ बजाने और नगमें और तराने गाने की इजाजत दी गई है।

मोहम्मद बिन हातिब (रजि0) से मरवी है नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया – "हराम और हलाल के बीच फर्क करने वाली चीज डफ बजाना और निकाह में आवाज बुलंद करना है।" (निसाई)


इससे सिर्फ यह नतीजा निकलता है कि खास मौकों पर डफ बजाया जा सकता है जिसका मकसद निकाह का एलान करना और खुशी का इजहार करना है ताकि शादी खुफिया न रहे। इसलिए हुक्म भी दिया गया है ‘‘निकाह का एलान करो’’। यानि एलानिया निकाह करो खुफिया न करो। इस हुक्म से मकसूद खुफिया निकाहों को रोकना है। आजकल वली(माँ बाप) की इजाजत के बगैर खुफिया निकाह बसूरत लव मैरिज, सीक्रेट मैरिज और कोर्ट मैरिज हो रही हैं। अदालतें इनको सनद जवाज दे रहे हैं।

बहरहाल डफ बजाने का काम सिर्फ छोटी यानि नाबालिग बच्चियां कर सकती है। बालिग औरतों को इसकी इजाजत नहीं है और ना मर्दों को इसकी इजाजत है। फिर यह काम महदूद पैमाने पर होना चाहिए। मोहल्ले की या खानदान या कबीले की बच्चियों को जमा न किया जाए। मेंहदी की रस्म और इसमें नौजवान बच्चियों का सरेआम नाचना गाना वीडियों और फिल्में बनाना बेपर्दगी और बेहयाई का इर्तिकाब बैण्ड बाजे, म्यूजिकल धुने और म्यूजिकल शो, आतिशबाजी वगैरह यह सब गैरों की नक्काली है और इस्लामी तहजीब और रिवायतों के बिल्कुल खिलाफ है। इस्लाम से इसका ना कोई ताल्लुक है और न हो सकता है।


रायज जहेज एक लानत है इसके बाइस सिर्फ खानदान तबाह व बर्बाद हो रहे हैं। मुस्लिम समाज के लिए इस माहौल में जिसमें दीनी तर्बियत और तालीम की कमी को पहाड़ काटने से कम दुश्वार नहीं बना दिया है। दरअस्ल यह गैर फितरी चलन हिंदुस्तानी, हिन्दू रस्म रिवाज का नतीजा है - जिसका खामियाजा हव्वा की बेटी को भी भुगनता पड़ रहा है। 

कुछ माँ बाप कर्ज लेके शादिया तक करते हे बेटियो की और फिर कर्ज से मर भी जाते हे, औरतों को खुदकुशी के लिए मजबूर किया जा रहा है क्योंकि माँ-बाप  के पास दहेज में देने के लिए माल व असबाब नहीं है।

कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है- ऐ ईमान वालो ! आपस में एक दूसरे का माल नाहक मत खाओ। (निसा-29)



To be continued ...
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