इस्लाम में औरतो के हुकूक और गैर धर्म में क्या? Part-14

इस्लाम में औरतो के हुकूक और गैर धर्म में क्या? Part-14

इस्लाम में औरतो के हुकूक और गैर धर्म में क्या? Part-14


जहेज़( दहेज) जेसी जुल्म वाली रस्म और इस्लाम 👇🏻

नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया-

आम तौर से किसी औरत से निकाह चार कारणों से किया जाता है :
1 उस की माल की वजह से,
2 उस के ख़ानदान की वजह से,
3 उस के हुस्न की वजह से,
4 उस दीन [ नेक, धर्मनिष्ठ, अच्छे आचरण] की वजह से।

"अत: तुम दीनदार औरत से शादी करो।[ बुखारी हदीस नंबर 5090 ]

इसकी मजीद शरह एक दूसरी हदीस में इस तरह है – "तुम औरतों से उनके हुस्न की वजह से निकाह मत करो क्योंकि हो सकता है कि उनका हुस्न उन्हें तकब्बुर में मुब्तेला करके हलाक कर दे और उनसे माल व दौलत की बिना पर भी निकाह मत करो क्योंकि हो सकता है कि उनका माल व दौलत उन्हें सरकश बना दे। लेकिन "तुम दीनदारी की बिना पर उनसे निकाह करो।" (इब्ने माजा)

कहा जाता है कि नबी करीम (ﷺ) ने अपनी बेटी हजरत फातिमा (रजि0) को कुछ चीजे शादी के मौके पर अता फरमाई थी। लेकिन अस्ल वाक्या यह है कि हज़रत अली की ज़िरह को बेच कर कुछ सामान खरीदा गया था। सीरत निगारों के बयान के मुताबिक हजरत अली (रजि0) के पास मेहर में देने के लिए सिर्फ एक जिरह थी जो उन्होंने बतौर मेहर हाथों-हाथ दे दी थी। इसलिए नबी करीम (ﷺ) ने उसको फरोख्त करा दिया और उस रकम का इस्तेमाल बिस्तर, तकिया और कुछ चीजें मुहैया कराने में किया।

"अगर जहेज़ की किस्म का कोई तसव्वुर होता तो नबी करीम (ﷺ) अपनी बाक़ी बेटियों के साथ भी ऐसा ही मामला फरमाते।" लेकिन यह बात वाजेह है आप (ﷺ) ने "किसी भी बेटी को दहेज नहीं दिया।" हजरत अली (रजि0) खुद नबी करीम (ﷺ) की किफालत में थे और आप (ﷺ) के पास रहा करते थे। हजरत अली (रजि0) के जिरह को फरोख्त करके कुछ सामान मुहैया कराने में आप (ﷺ) हजरत अली के साथ शरीक हुए। इसलिए दहेज तलाक और जाहिलाना रस्मो रिवाजो के खिलाफ तहरीक चलाने की जरूरत है।

"इस मैदान में नौजवान तबके को आगे बढ़कर इस्लाही कदम उठाना होगा।"




To be continued ...
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