इस्लाम में औरतो के हुकूक और हमने क्या दिया ? Part-15

इस्लाम में औरतो के हुकूक और हमने क्या दिया ? Part-15

इस्लाम में औरतो के हुकूक और हमने क्या दिया ? Part-15


औरत एक ज़िंदा वुजूद है। एक ऐसा वुजूद, जिसके दम से ज़िंदगी का वुजूद है। उसके अंदर रूह भी है और एक मन भी। वह केवल शरीर नहीं है।

आज तक औरत के शरीर को ही जाना गया है या फिर बहुत ज़्यादा हुआ तो उसके मन को। सारी दुनिया के बड़ी बड़ी किताबे, किस्से कहानी, उसके हुस्न की तारीफ़ से भरे पड़े हैं, जिन्हें बार-बार दोहराया गया और ज़्यादातर औरत को मूर्ख(बेवकूफ) बनाया गया, उसके विश्वास को छला गया। आज की औरत मर्द के प्रति अपना Natural विश्वास खो चुकी है। चंद घंटों की बच्ची से लेकर बूढ़ी औरतों तक, हरेक की आबरू की धज्जियां उड़ाने वाला मर्द ही है। ज़्यादातर उन्हें ऐसी सज़ा नहीं मिल पाती, जो वाक़ई सज़ा और दूसरों के लिए इबरत साबित हों। मुजरिम केवल बलात्कारी ही नहीं होते, मुजरिम केवल उन्हें छेड़ने और सताने वाले ही नहीं होते बल्कि वे भी उनके जुर्म में बराबर के शरीक हैं जिन्होंने औरत को पहले तो कमज़ोर बनाकर ज़ालिमों के लिए एक तर निवाला बना दिया और फिर उसे सुरक्षा भी नहीं दे पाए। पर्दा हुआ या किसी रस्मो रिवाज की जगह, न इसका सही इल्म दिया और दिया भी तो टुटा फूटा पहले गैर-मजहबी रस्मो में धकेला। हल्दी मेहँदी खेलना,डांस करना,गीत रंग करना फिर कुछ इल्म होने के बाद उस पर थोपना और फिर उस को परेशान करके उस पर जुल्म करना मारना पीटना जैसे वो बहुत गुनाह कर रही हो

बेशक गुनाह है, लेकिन विश्वास दिलाकर सब समझाया और बताया जा सकता हे। एक औरत को इल्म दिया जाए तो एक बेहतरीन Guidance Professor बन सकती हे वही इसका उल्ट भी।

‘हम सब मुजरिम हैं।‘ पहले हमें यह मानना होगा। तभी हम अपनी आत्मा और ज़मीर पर वह घुटन महसूस कर पाएंगे जो कि हमें अपनी सोच और अपने अमल को सुधारने के लिए मजबूर करेगी।

पुराना वक़्त और आधुनिक, दोनों अपने ओरिजिनल माहोल में जो भी लाभदायक बातें हैं उन्हें लेते हुए हमें नए सिरे से उस व्यवस्था की खोज करनी होगी जो औरत को शरीर, मन और आत्मा तीनों स्तर पर स्वीकारने के लिए हमें एक्टिव(प्रेरित) भी करे और यह भी बताए कि हम पर उसके क्या हक़ हैं और उन्हें अदा कैसे और किसलिए किया जाए ?
उन्हें दीनी तालीम और दुनियावी तालीम से जोड़ा जाए।

औरत मां है, बहन है, बेटी है। किसी के साथ कभी भी और कुछ भी हो जाता है। किसी की भी मां-बहन-बेटी के साथ कुछ भी हो सकता है। सभी सुरक्षित रहें और आज़ाद रहते हुए अपनी पसंद के फ़ील्ड में अपनी सेवाएं देकर समाज को बेहतर बनाएं, (गैर मजहबी बोहतान और मुद्दों की समझाया जाए,असल हुकूक से वाबस्ता किया जाय) अब औरत की आहों पर, उसकी कराहों पर सही तौर पर ध्यान देना होगा और उसके दुख को, उसके दर्द को गहराई से समझना होगा ताकि उसे दूर किया जा सके।


औरत भी यही चाहती है। औरत सरापा मुहब्बत है। वह सबको मुहब्बत देती है और बदले में भी फ़क़त वही चाहती है जो कि वह देती है।

आज का माहौल कुछ इस तरह हो गया न मर्द को इल्म है न बच्चों को, और दुनियावी माहौल में TV की महफ़िल- ऐसे ऐसे कामों को सीख देने में लगी हे जिसके बारे में सोच कर भी रूह काप जाए(आगे के पार्ट में क्लियर करेगे क्या क्या हो रहा है)
मर्द अगर इल्म वाले हो जाये तो मआशरे में अल्हम्दुलिल्लाह बहुत फर्क पड़ जाये। लेकिन न मर्द दीनी मजलिसों से जुड़ रहा हे न औरतो को जुड़ने देता।




To be continued ...
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