इस्लाम में मर्द औरतो के हुकूक और मुसलमान कितने दूर ? Part-16

इस्लाम में मर्द औरतो के हुकूक और मुसलमान कितने दूर ? Part-16

इस्लाम में मर्द औरतो के हुकूक और मुसलमान कितने दूर ? Part-16



हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि से रिवायत हैं के नबी सल्लललाहू अलैह वसल्लम ने फ़रमाया के "आपस मे मोहब्बत रखने वालो के लिये निकाह जैसी कोई दूसरी चीज़ नही देखी गयी|" (इब्ने माजा)

निकाह मे होने वाली ज़ात बिरादरी की बन्दिश -

अकसर लोग निकाह के लिये अपने ही बिरदरी मे लड़का या लड़की को पसन्द करते हैं और जब तक अपनी बिरादरी मे कोई नही मिलता निकाह नही करते। जिसके सबब अकसर दूसरे बिरादरी के लड़के और लड़किया बेनिकाह काफ़ी उम्र तक बैठे रहते हैं और कई तो ताज़िन्दगी बे निकाह रह जाते हैं और इसकी ज़िन्दा मिसाल हमारे मआशरे मे मौजूद हैं| अल्लाह कुरअान मे फ़रमाता हैं -
"और उस(इंसान) की दो जातियाँ बनाई - पुरुष और स्त्री (सूरह कियामा 75:39)

इस्लाम की ये खूबी हैं के इस्लाम मे इन्सान कि फ़ितरत के सबब हर मसले का हल रखा और किसी मसले के हल के लिये बस इन्सान को अल्लाह और उसके रसूल के बताये एहकाम पर अमल करना हैं। बावजूद इसके लोग इस्लाम के बताये तरीको से फ़ायदा नही उठाते और नुकसान मे रहते हैं।

अल्लाह ने इन्सान की तख्लीक के लिये सिर्फ़ एक जोड़ा आदम अलै• और हव्वा अलै• को बनाया और इनसे तमाम नस्ल इन्सानी की तख्लीक की अगर अल्लाह ने ज़ात बिरादरी की बन्दीश को भी इन्सान के निकाह के शर्त के तौर पर लगाया होता तो आदम अलै• और हव्वा अलै• के बाद दुनिया मे कोई इन्सान नही होता या अल्लाह आदम अलै• और हव्वा अलै• की तरह कई और जोड़े पैदा कर दुनिया मे एक सिस्टम बना देता के हर इन्सान अपनी ही पुरखो की नस्ल मे निकाह करे।
कई और जोड़े आदम अलै• और हव्वा अलै• की तरह पैदा करना अल्लाह के लिये कोई मुश्किल काम नही| बावजूद इसके इन्सान इन तमाम बातो पर गौर फ़िक्र किये बिना ही इस अहम सुन्नत को अदा करने मे ताखिर करता हैं| अल्लाह ने कुरआान मे एक जगह और फ़रमाया -
"ऐ लोगो अल्लाह से डरो जिसने तुम्हे एक जान से पैदा किया और उसी में से उसके लिये जोड़ा पैदा किया और उन दोनो से बहुत से मर्द और औरत फ़ैला दिये। (सूर: निसा सूर: नं 4 आयत नं 1)
कुरआन की इस आयत से साबित हैं के अल्लाह ने हर मर्द और औरत का जोड़ा बनी आदम की औलादो में से ही रखा हैं लिहाज़ा हर इन्सान को जो ईमानवाला मर्द या औरत मिले उसे बिना ताखिर के निकाह कर लें। क्योकि किसी इन्सान को खुद से ये हासिल नही के ज़ात बिरादरी मे बट जाये बल्कि ज़ात बिरादरी मे बाटना भी अल्लाह ही का काम हैं जैसा के कुरआन से साबित हैं -
"अल्लाह वही हैं जिसने इन्सान को पानी से पैदा किया| फ़िर उसे नस्ली और खान्दानी रिश्तो मे बाट दिया। (सूर: फ़ुरकान सूर: नं 25 आयत नं 54)
लिहाज़ा जात बिरादरी की बन्दीश को निकाह जैसे नेक काम से जोड़ना सरासर गलत हैं क्योकि अल्लाह ने नस्ल और खानदान सिर्फ़ इन्सान की पहचान बाकि रखने के लिए किया न के निकाह के मौके पर अपने से दूसरे को नीचा या बड़ा खानदान तसव्वुर करना सरासर गलत हैं। बिरादरी का तसव्वुर सिर्फ़ इन्सान को बड़ा या छोटा साबित करता हैं जबकि ये अल्लाह ही बेहतर जानता हैं कि उसके नज़दीक कौन बड़ा या छोटा हैं|

बिरादरी से बाहर निकाह करने की सबसे बड़ी हुज्जत हज़रत अबदुर्ररहमान बिन औफ़ रजि0 का निकाह हैं जो कुरैश खानदान से थे और उन्होने अंसार की लड़की से निकाह किया था और खुद अल्लाह के रसूल सल्लललाहू अलैह वसल्लम ने हज़रत सफ़िया से निकाह किया था जो कुरैश खानदान से न थी|




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