इस्लाम में नारी का महत्व और सम्मान -Part-2
इस्लाम में नारी का महत्व और सम्मान -Part-2

जिस तरह इस्लाम में नारी के रूप में माँ को जन्नत के पेरो तले बताया हे और बहुत इज्जत करने को कहा हे उसी तरह पति पर अनिवार्य है कि वह अपनी पत्नी के साथ भलाई के साथ (परंपरागत) रहन सहन करे, और उसके खर्च यानी खाना, पानी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था करे, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है।

وَعَاشِرُوهُنَّ بِالْمَعْرُوفِ [النساء : 19]

''और उनके साथ भलाई के साथ (परंपरागत) रहन सहन करो।'' (सूरतुन्निसा : 19)

तथा ने मुआवियह बिन हैदा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्हों ने कहा :

''मैं ने कहा : ऐ अल्लाह के पैगंबर! हमारी बीवी का हमारे ऊपर क्या हक़ है? आप ने फरमाया : जब तुम खाओ तो उसे खिलाओ, जब तुम पहनो या कमाई करो तो उसे पहनाओ, और चेहरे पर न मारो, और उसे बदसूरत (कुरूप) न कहो, और घर के अलावा कहीं न छोड़ों।'' अबू दाऊद कहते हैं : (ला तुक़ब्बिह) ''कुरूप न कहो''का अर्थ यह है कि ''क़ब्बहकिल्लाह'' (अल्लाह तआला तुझे विरूपित करे) न कहो।(अबू दाऊद हदीस संख्या : 2142)

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कई हदीसों में औरतों के साथ भलाई करने की वसीयत की है। अतः पति को चाहिए कि अपनी पत्नी के बारे में अल्लाह तआला से डरे, और हर हक़ वाले को उसका हक़ दे। माता पिता के साथ सद्व्यवहार और रिश्तेदारों के साथ रिश्तेदारी निभाने का, पत्नी के साथ अच्छा व्यवहार करने, उसका सम्मान करने और उसका ख्याल रखने के साथ आपस में कोई टकराव नहीं है। सबसे अच्छी चीज़ जिसके द्वारा आप उसे नसीहत कर सकती हैं वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फरमान है :

''तुम में सबसे अच्छा वह व्यक्ति है जो अपने परिवार (पत्नी) के लिए सबसे अच्छा हो और मैं अपने परिवार के लिए सबसे अच्छा हूँ।'' (तिर्मिज़ी हदीस संख्या : 3895)(इब्ने माजा हदीस संख्या : 1977)

उक्त हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अच्छा होने का मापदण्ड परिवार का आदर सम्मान करने को बताया है। अतः जो व्यक्ति अच्छे मुसलमानों में से बनना चाहता है वह अपने परिवार के साथ अच्छा व्यवहार करे। और यह पत्नी, बाल बच्चों और रिश्तेदारों के साथ सद्व्यवहार करने को सम्मिलित है।

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन (उसे याद दिललाएं) : ''तुम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए जो कुछ भी खर्च करोगे उस पर तुम्हें अज्र व सवाब मिलेगा, यहाँ तक कि जो (लुक़्मा) तुम अपनी पत्नी के मुँह में डालते हो।'' (सहीह बुखारी, हदीस संख्या : 56)
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