इस्लाम में औरतो के हक, सम्मान और इज्जत Part-4

इस्लाम में औरतो के हक, सम्मान और इज्जत Part-4


इस्लाम लोकतान्त्रिक मज़हब है और इसमें औरतों को बराबरी के जितने अधिकार दिए गए हैं उतने किसी भी धर्म में नहीं हैं अल्हम्दुलिल्लाह ।


माँ की हैसियत ये बताई गयी है बेटियो बहनो की और पत्नी की भाई बहुत सम्मान जनक तरीके से एक्सप्लेन किया हे

1930 में, एनी बेसेंट ने कहा, “ईसाई इंग्लैंड में संपत्ति में महिला के अधिकार को केवल बीस वर्ष पहले ही मान्यता दी गई है,

जबकि इस्लाम में हमेशा से इस अधिकार को दिया गया है। यह कहना बेहद गलत है कि इस्लाम का कहना है कि महिलाओं में कोई आत्मा(Soul,रूह) नहीं है ।” (जीवन और मोहम्मद की शिक्षाएं, 1932)

डॉक्टर लिसा (अमेरिकी नव मुस्लिम महिला)मैंने तो जिस धर्म (इस्लाम) को स्वीकार(Accept) किया है वह स्त्री को पुरुष से अधिक अधिकार देता है।

डॉक्टर लिसा एक अमेरिकी महिला डॉक्टर हैं, लगभग तीस साल पहले मुसलमान हुई हैं और मुबल्लिगा हैं, यह इस्लाम में महिलाओं के अधिकार के संबंध में लगने वाले आरोपों का जवाब देने के संबंध में काफी प्रसिद्ध हैं।

उनसे सवाल किया गया कि –
“आप ने एक ऐसा धर्म क्यों स्वीकार किया जो औरत को मर्द से कम अधिकार देता है”?

उन्होंने जवाब में कहा कि –
“मैंने तो जिस धर्म को स्वीकार किया है वह स्त्री को पुरुष से अधिक अधिकार देता है”,

पूछने वाले ने पूछा वो कैसे?
डॉक्टर साहिबा ने कहा *“सिर्फ दो उदाहरण से समझ लीजिए”,
– पहली यह कि “इस्लाम ने मुझे चिंता आजीविका से मुक्त(आजाद) रखा हे (मतलब बिना टेंसन के जिंदगी जीनेके माहोल में रखा हे ) यह मेरे पति की जिम्मेदारी है कि वह मेरे सारे खर्च पूरे करे”, चिंता आजीविका से बड़ा कोई बोझ नहीं और अल्लाह हम महिलाओं को इससे पूरी तरह से मुक्ति(आजाद) रखा है, शादी से पहले यह हमारे पिता की जिम्मेदारी है और शादी के बाद हमारे पति की।

दूसरा उदाहरण यह है कि “अगर मेरी संपत्ति(जायदाद) में व्यापार(Bussiness) या और कोई रकम आदि हो तो इस्लाम कहता है कि यह सिर्फ तुम्हारा है तुम्हारे पति का इसमें कोई हिस्सा नहीं है”,


To be continued ...

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