इस्लाम में औरतो के हुकूक और गैर धर्म में क्या ? Part-9

इस्लाम में औरतो के हुकूक और गैर धर्म में क्या ? Part-9


बात बहूत पुरानी है - वृंदावन में सड़क पर एक विधवा का शव देखा गया। स्थानीय लोगों ने उस महिला का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया। उनका कहना था कि विधवा का शव छूने से अपशकुन होता है। ऐसे अंधविश्वासों की वजह से ही विधवाओं का शोषण होता है।

वह विधवा सामाजिक कार्यकर्ता हैं, लेखिका हैं और महिला आंदोलन की नेता भी। मोहिनी गिरी 40 साल से भारत व दक्षिण एशिया में युद्ध प्रभावित परिवारों के लिए संघर्ष करती रही हैं।

पेश है अमेरिका की केन्टकी यूनीवर्सिटी के एक कार्यक्रम में विधवाओं के हालात पर हुए मोहिनी गिरी के भाषण के कुछ हिस्सा -
मैं आज यहां आपसे विधवाओं के मुद्दे पर बात करना चाहती हूं। आप पूछेंगे कि भला इस मंच पर विधवाओं का मुद्दा क्यों?
हमें एक-दूसरे की समस्याओं के बारे में पता होना चाहिए ताकि समाधान (हल) की दिशा में कदम उठाए जा सकें। दुनिया भर में बड़ी संख्या में महिलाएं युद्घ व हिंसा की वजह से अपने पतियों को खो देती हैं।


काश! ये लड़ाईयां खत्म हो जाएं। ऐसा हुआ तो यकीनन यह दुनिया एक बेहतर जगह बन पाएगी। विधवाओं के साथ हमेशा से भेदभावपूर्ण व्यवहार होता रहा है। वर्ष 2010 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 4.5 करोड़ विधवाएं हैं। इनमें से 4 करोड़ महिलाओं को विधवा पेंशन नहीं मिल पाती। रीती रिवाज के नाम पर इन्हें इनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है, परिवार के अंदर उन्हें बोझ समझा जाता है।

भारत में विधवाओं के खराब हाल के लिए काफी हद तक पितृसत्तामक व्यवस्था जिम्मेदार हे -इसमें परिवार के अंदर सारे अधिकार पति के पास होते हैं। ऐसे में पति की मौत होते ही महिला से सारे अधिकार छिन जाते हैं और उसका शोषण शुरू हो जाता है। कहने के लिए तो देश में महिलाओं के लिए कई कानून हैं। लेकिन असल में इन कानूनों का पालन नहीं हो पाता है। अक्सर पति की मौत के बाद घर की जमीन भाइयों और बेटों में बंट जाती है और विधवा महिला पूरी तरह असहाय हो जाती है। मुझे भी ऐसी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। मेरे पति ने अपनी मौत से पहले अपनी सारी संपत्ति मेरे नाम कर दी थी, लेकिन मुझे यह अधिकार हासिल करने के लिए कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ा। मुझसे कहा गया कि मैं अपने बेटों से इस बारे में एनओसी लेकर आऊं।

दूसरी शादी नहीं -


हमारे यहां विधवाओं की दूसरी शादी का चलन ही नहीं है। पति की मौत के बाद पत्नी को बाकी की जिंदगी अकेले ही बितानी होती है। भारतीय परंपरा में माना जाता है कि शादी सात जन्मों का रिश्ता है। ऐसे में विधवा स्त्री दूसरे विवाह के बारे में सोच भी नहीं सकती। पति की मौत के बाद उसे पूरे जीवन कठिनाइयों से जूझना पड़ता है। परंपरा के नाम पर इन्हें सफेद धोती पहननी पड़ती है। विधवाओं के लिए सज-संवरकर रहना गलत माना जाता है।

आगे का हिस्सा इस बहन की कहानी अगले पार्ट में
अब सोचो मेरी बहनो की इस्लाम कितना खूबसूरत और भलाई करने वाला मजहब हे 😊 जो निकाह से पहले ,निकाह के बाद और खामिद की मोत(फोंत) होने के बाद भी जिंदगी बसर करने को कह रहा ह,सिखा रहा हे बता रहा हे जोर जोर दे दे कर अमल करने को कह रहा हे, इस्लाम ने विधवा की भावनाओं(Feeling) का बड़ा ख्याल किया बल्कि उनकी देख भाल और उन पर खर्च करने का बड़ा पुण्य(Sawab) बताया है।

नबी करीम सल्लल्लाहु अलैही वस्सलम ने फरमाया ; "बेवा और मिसकीन के लिए कोशिश करने वाला अल्लाह के रास्ते मे जिहाद करने वाले कि तरह है या उस शख्स की तरह है जो दिन में रोज़ रखता है और रात को इबादत करता है।"
– (सहीह बुखारी 6006)

जैसा की विधवा औरत के बारे में जानना होतो अम्मा खदीजा और हमारे नबी सल्लाहु अलैहि वसल्लम का वाकिया और हमारे लिये हिदायत देखे
। और मेने पिछले पार्ट-5 में बताया भी हे



To be continued ...

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