मुसलमानो ने देश की आज़ादी के लिए क्या किया ?

जंगे आज़ादी में मुसलमानों की भूमिका

✦ मुसलमानो ने देश की आज़ादी के लिए क्या किया ?

✦ देश की आज़ादी के लिए क़ुर्बान होने वाले मुस्लिम स्वतन्त्रता सेनानियों को क्यों भूल गया देश..?

Independence Day 2021: अज़ीज़ मुल्क़ भारत में आज़ादी के जश्न की धूमधाम है। भारत की जंगे आज़ादी के अज़ीमुश्शान शहीदों को याद करने की रस्म बड़ी शान ओ शौकत से निभाई जा रही है। और आज़ादी के शहीदों को ख़िराजे अक़ीदत पेश किया जा रहा है।

मगर साथ ही एक मुसलमान और एक भारतीय नागरिक होने से हमारे दिलों में कहीं ना कहीं ये टीस उठती है कि आखिर मुजाहिदीन-ए-आज़ादी के ज़िक्र में उन अज़ीमुश्शान मुस्लिमो को क्यों शामिल नहीं किया जाता जिनकी जद्दोजहद के बग़ैर देश की आज़ादी का सोचना ही सम्भव नही है।

आजादी का आंदोलन और भारतीय मुसलमान

नवाब सिराजुद्दौला, शहीद टीपू सुल्तान से लेकर 1857 में आखिरी मुग़ल शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र और उसके बाद 1947 तक की आज़ादी की जद्दोजहद में बेशुमार क़ुरबानियां पेश की जा चुकीं थीं। 

1757 से 19वीं सदी के आखिर तक ‪ ‘मुसलमान’ अकेले अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ते रहे। इसका कोई सटीक अन्दाज़ा नहीं कि कितने आज़ादी के मतवालों ने वतन ए अज़ीज़ के लिए अपना खून बहाया, अपने घर बार लुटाए अपनी बेशकीमती जवानियों को खाक कर दिया और यहाँ तक की अपनी जान तक क़ुरबान कर गये।

अंग्रेजो के जुल्म के खिलाफ पहली आवाज़ मुसलमाँनो ने उठायी :

अंग्रेज़ों से बगावत की मामूली सज़ा ‪फांसी थी। फांसी से कोई बचा तो काला पानी था जहां मुजाहिदीने आज़ादी के साथ ज़ुल्म ओ बर्बरीयत का सुलूक किया जाता था इस अज़ाब खाने में ‪उल्मा, ‪‎मौलवी, मुफ्तीयों, मुस्लिम‪ नवाबों और ‪जागीरदारों ने कैसी कैसी जिस्मानी और ज़हनी सज़ाएं झेल कर आज़ादी हासिल की थी ये सोच कर या पढ़ कर ही दिल कांप जाता है।

मुस्लिम क्रांतिकारियों के नाम

वैसे तो मुस्लिम क्रांतिकारियों के नाम से पुरे इतिहास के पन्ने रोशन है लेकिन हम यहां कुछ ही का जिक्र करेंगें, आपको बता दे की अंग्रेज़ों के खिलाफ ‪‎जेहाद का ‪फतवा 1806 में शाह अब्दुल अजीज़ ने दे दिया था। मौलाना कासिम नानौतवी, ‪ हाजी आबिद हुसैन, ‪‎मौलाना रशीद अह्मद गंगोही ने देश की आज़ादी के लिए ज़हन साज़ी और तर्बियत के लिए ‪ दारुल उलूम देवबन्द, जामिआ कासिमया शाही मुरादाबाद, ‪मज़ाहिर उल उलूम सहारनपुर आदि जैसे अज़ीमुश्शान तालीमी और तरबियती मदरसों की बुनियाद रखी।

दारुल उलूम देवबन्द

दारुल उलूम देवबन्द

इनके अलावा शेखुल हिन्द हज़रत मौलाना महमूद हसन साहब, ‪मौलाना अज़ीज़ गुल, ‎हकीम नुसरत हुसैन,‪ रहीमउल्लाह, ‪‎मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली, ‪ मौलाना मुहम्मद मियां अन्सारी, ‎मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान, अशफाक उल्लाह ख़ान, मौलाना मोहम्मद अली ज़ोहर और हज़ारो मुस्लिम लीडर और लाखो की तादाद में आम जनता जंगे आज़ादी में शामिल थे जिसमे से कइयों को जिला वतन, कैद और फाँसी की सजा मिली।

मुस्लिम धर्म गुरुओं से पहले किसी को आज़ादी की सोच न थी

मुस्लिम ओलमओ (धर्म गुरु) से पहले किसी के दिमाग में मुकम्मल आज़ादी की सोच भी साफ़ नही थी।

1857 की जंग में कुछ गद्दारो के कारण हार मिली और चन्द दिनों में ही 70 हज़ार मुस्लिम धर्मगुरुओं को फाँसी दी गई और सैकड़ो आम लोग मारे गए।

आज हमारी नोजवान पीढ़ी में शायद ही कोई ऐसा नौजवान हो जो इन शहीदों के बारे में जानता हो? लेकिन हमे कोशिश करना चाहिये इन बुज़ुर्गों के बारे में जानने की।

🌺🌺🌺 जश्ने आज़ादी की तेहदिल से मुबारकबाद! 🌺🌺🌺

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